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संहिता

भारत व भारतीयता से जुड़े सभी साहित्यिक,सांस्कृतिक व सामाजिक प्रयासों,हिन्दी में रचनात्मक लेखन (विविध विधाएँ),भाषिक मंतव्यों,जीवनमूल्यों,पारस्परिक आदान-प्रदान की अभिवृद्धि हेतु
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Guest Book

 
3/4/2009

कृतं कर्मं शुभाशुभम्




March 02, 2009

[चर्चाकारः कविता वाचक्नवी] [18 टिप्पणियाँ]








फागुन की मस्ती का रंग चहुँ ओर छाने लगा है। चर्चा के नव-नव प्रयोगों द्वारा गत सप्ताह चर्चाकारों ने आपको खूब सराबोर कियामस्ती का आलम यह कि सब ओर जैसे कविता की बरसात हो रही थी। सब झूमने को मानो तैयार बैठे हैंउत्तर भारत में रंगों की रंगीनी धरती पर अपना जादू बिखेरने लगी होगीउत्तर में होली के साथ ही इन दिनों पतंगबाजी की शुरुआत होती हैलोग घरों से निकल छतों पर आते हैंआप सब भी प्रकृति के कृषि के इस ठेठ भारतीय पर्व पर नव सस्य की प्रतीक्षा में होंगेहोली मेरे देश के किसान के जीवन में खूब वैभव का रंग छितरा दे ! इस कामना के साथ चर्चा आरम्भ की जाती है । उसी अपने पारंपरिक किंतु किंचित परिवर्तित रूप में.




भारतीय
भाषाएँ




मराठी


कल ही मैंने गिरिराज जी के फिलहाल पर कवि केदारनाथ सिंह को भारत - भारती सम्मान देने वाले आयोजन की दुर्दशा की व्यथा कथा पढ़ी। मराठी ब्लॉग जगत से प्राप्त इस समाचार को उक्त समाचार के साथ रखकर देखा जा सकता है -






हा तर महाराष्ट्राचा अपमान॥



स्वरभास्कर पंडीत भीमसेन जॉशी यांच्या आयुष्यातील अत्युच्च सन्मानाच्या क्षणी ज्येष्ठ राजकीय नेत्यांच्या तसेच राष्ट्रपतींच्या अनुपस्थितीबद्दल भारतकुमार राउत यांनी मन:पुवर्क या सदरात घेतलेला आक्षेप योग्यच आहे. 'उरकण्यात' आलेल्या या संमारभाने अख्ख्या महाराष्ट्राचा अपमान केलेला आहे.जणु काही या पंडीतजीना 'भारतरत्न्' देण्याच्या सोह्ळ्यात सहभागी झालो तरी त्याचा राजकिय फायदा काय? असा विचार करुन ज्येष्ठ मराठी नेत्यांनी केलेला दिसतो.पंडीतजीना 'भारतरत्न्' देताना आवश्यक तर सारे राजशिष्टाचार बाजुला ठेवून सर्वच नेत्यांनी त्यांच्या घरी जाणे आवश्य्कच होते.त्यातच महाराष्ट्राची शान राहीली असती.
ही माझी प्रतिक्रिया 'महाराष्ट्र टाइम्स' मघ्ये रोजी २२/२/२००९ प्रसिध्द झालेली आहे.





- महाराष्ट्र नव निर्माण सेना द्वारा मराठीभाषा अकादमी की पुनर्स्थापना का रोचक समाचार भी आप स्वयं बाँच ही लीजिए -




मनसे करणार `मराठी भाषा अकादमी’ची स्थापना


श्री. प्रशांत कोयंडे, मुंबई
मुंबई, २८ फेब्रुवारी - महाराष्ट्रासह मराठी बांधवांच्या उत्कर्षाचे ध्येय समोर ठेवून स्थापन करण्यात आलेल्या महाराष्ट्र नवनिर्माण सेनेने मराठी भाषेची सर्वत्र होणारी अवहेलना थांबवण्यासाठी व मराठीला पुढे नेण्यासाठी `मराठी भाषा अकादमी’ची स्थापना करण्याचा निर्णय घेतला आहे.

(`अकादमी’ हा शब्द `अँकॅडमी’ या इंग्रजी शब्दाचे भ्रष्ट रूप आहे. तरी मराठी भाषाप्रेमी मनसे मराठीच्या उत्कर्षासाठी स्थापन करण्यात आलेल्या संस्थेचे नाव शुद्ध मराठीत करेल काय ? - संपादक) याबाबतची माहिती काल पक्षाने सुरू केलेल्या www.manase.org या संकेतस्थळावर देण्यात आली आहे. महाराष्ट्र नवनिर्माण सेनेच्या संकेतस्थळाचे उद्घाटन पक्षाचे अध्यक्ष श्री. राज ठाकरे यांच्या हस्ते काल वांद्रे येथील रंगशारदा सभागृहात आयोजित करण्यात आलेल्या कार्यक्रमात करण्यात आले. या संकेतस्थळाच्या माध्यमातून महाराष्ट्रातील मराठी माणसांच्या समस्या सोडवण्याचा प्रयत्‍न करणार असल्याचे श्री. ठाकरे यांनी या वेळी सांगितले. या संकेतस्थळाचे काम पुणे येथील श्री. अनिल शिदोरे हे पहात आहेत. मराठी भाषेविषयी कार्य करू इच्छिणार्‍या संस्था व व्यक्‍ती या अकादमीच्या अधिक माहितीविषयी श्री. शिदोरे यांना संपर्क करू शकतात. संपर्क : श्री. अनिल शिदोरे (०२०) २६०५९२८२/८३





पंजाबी


`
'तनदीप
तमन्ना' के सौजन्य


कुझ हाइकू



अलटरासाउंड कोश

जीवन शबद पुलिंग

मौत इसतरी लिंग

-------

महांनगर दी रौशनी

खा गी चंन दी चानणी

तारे गए गुआच

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सफ़र आखरी

बेबे झोल़े विच

चली कीरतपुर

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छाउंणी कबरसतान

कबर-शिला ते बैठा

बकरी चारदा बचा

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सुके खूह दीआं टिंडां

पंछीआं पाए आल्हणे

छते लाए भरिंडां


सतिकारत अमरजीत साथी जी दी किताब निमख चों धंनवाद सहित



कविता का मन


भारत में, विशेषतः हिन्दी में, साहित्य के मरने या उसमें भी कविता के मरने की आशंका दिन - प्रतिदिन साहित्य के कुछ आलोचकों को घेरे रही. कविता जिस गति से हाशिए पर धकेल दी गयी, (गत कई दशकों से संभवत वह कभी केन्द्रक में थी ही नहीं) उसने कविता की आसन्न अवगति के संकेत तो दे ही दिए थे। परिणाम के रूप में दिखाई भी पड़ा कि कोई प्रकाशक कविता की पुस्तक को छापने का जोखिम नहीं उठाता; क्योंकि वह बिकती ही नहीं। इधर कवि भी "वादे वादे जायते तत्त्वबोध:" की भाँति विभिन्न कोटियों के हो गए। साहित्य व मंच तो पहले ही अलग हो चुके थे, किंतु मंच की भी कई प्रशाखाएँ बन गईं, जहाँ चुटुकुले से लेकर चोरी के घटिया माल तक को धड़ल्ले से चलाया - गाया गया, गलेबाजों की जोर आजमाईश हुई, फूहड़ व भोंडे हास्य प्रस्तुत किए गए। कुल मिला कर मंच से कविता अंतर्ध्यान हो गई। मंच पर असल कवि रहे ही नहीं। दूसरी और साहित्य में कविता इतनी नखरीली, सुविधाभोगी व परमुखापेक्षी हो गई कि पूरी की पूरी छद्म बन गई। नकली पुरस्कार, गुटबंदी, विश्वविद्यालयीय अध्यापकों द्वारा प्रकाशकों से एवज में पुस्तकें छपवाना, प्रायोजित समीक्षाएँ, सरकारी खरीद, शब्दाडम्बर, गद्य की टुकड़ाबंदी.... .. आदि जाने कितने बाह्याचार, छल व छद्म में वह मारी गई।


इधर जब से नेट पर साहित्य आने लगा तब से साहित्य के चोरों की भी बन आई। पर चोरी की जाने वाली सबसे बड़ी विधा आज भी कविता ही है । विश्वास न हो तो ऑरकुट और कई मनोरंजन केंद्रित समूहों पर जा कर नजारा ले लीजिए। साहित्य के ठेकेदारों ने इस प्रवृत्ति व ( लोकेषणा तथा इसके चलते की जाने वाली चोरी की) सुगमता को सुन जान कर नेट को साहित्य के लिए एकदम सिरे से खारिज भी किया।


किंतु यह सच है कि माध्यम स्वयं में कोई दूषित नहीं होता, प्रयोक्ता पर निर्भर करता है कि वह उक्त संसाधन का प्रयोग किस उद्देश्य की पूर्ति में कैसा करता है । यदि हम अपनी दूषित प्रवृत्ति, छपास व लोकेषणा को एक ओर करते हुए (तिलांजली देते हुए) इस संसाधन का उपयोग करें तो पूरे साहित्य के परिदृश्य को बदल सकते हैं । इसका एक सबल उदाहरण अभी साक्ष्य में आया है। क्योंकि यह विदेशी भाषा के नेट प्रयोक्ताओं से संबंद्ध है अत: इसे विश्व के अंतर्गत नीचे पढ़ें -



विश्व

यह समाचार हम सबके लिए, विशेषतः काव्य से प्रेम करने वालों के लिए अत्यन्त हर्षदायक सिद्ध होगा कि इंटरनेट कविता की हत्या करने की अपेक्षा उसके जीवन संवर्धन में सहाय्य सिद्ध हो रहा है और कवियों के लिए वरदान। अब वे अपनी प्रतिभा द्वारा अधिकाधिक पाठकों तक पहुँच पा रहे हैं। पूरे समाचार के लिए तो आपको स्वयं ही इसे पढ़ना पडेगा


By Stephen Adams, Arts Correspondent

Man reading poetry: Internet 'is causing poetry boom'

इसमें बताया गया कि -
Poetry Archive , which Mr Motion helped set up, now receives 135,000 visitors a month and a million page hits.



दूसरी ओर एक खेदजनक समाचार भी आया कि एक ऐतिहासिक पत्र, जो १५० वर्षों से नियमित निकल रहा था, उसे बंद कर देना पड़ा। हमारे यहाँ कुछेक वर्ष छाप कर जब पत्र - पत्रिका बंद होती है, तो भी क्षोभ से भर उठते हैं हम; फिर यह तो एक इतिहास का वर्त्तमान में उपस्थित होना -जैसी थी।



updated 5:50 a.m. ET Feb. 27, 2009

DENVER - Questions about the future of the Rocky Mountain News had become so common, the newspaper's staff put up a handwritten paper sign on the news desk that said, "We don't know."

On Thursday, someone wrote over it in heavy black marker: "Now we know."

Colorado's oldest newspaper, which launched in Denver in 1859, printed its last edition Friday, leaving The Denver Post as the only daily newspaper in town.



Image: last front page of the Rocky Mountain News
AFP - Getty Images
The last front page of the Denver, Colorado,


पूरे समाचार को स्वत: देखा जाना चाहेंगे।




कुछ कुछ ऐसा ही आगत की आहट देता समाचार एक और भी है -






Lewis Carroll's handwriting
In 1864, Lewis Carroll wrote his most famous work for Alice Liddell.

Jane Austen's handwriting
Jane Austen completed her last novel, Persuasion, in 1816
Lewis Carroll's handwriting
In 1864, Lewis Carroll wrote his most famous work for Alice Liddell.
Winston Churchill's handwriting
Aged 16, Winston Churchill wrote to his mother Lady Randolph Churchill
Jimi Hendrix's handwriting
Jimi Hendrix's lyrics for Machine Gun were written in 1969


Winston Churchill's handwriting
Aged 16, Winston Churchill wrote to his mother Lady Randolph Churchill

Jimi Hendrix's handwriting
Jimi Hendrix's lyrics for Machine Gun were written in 1969

King Henry VIII's handwriting
King Henry VIII wrote this love letter to Anne Boleyn (pic: British Library)


If everything we do still had to be done by hand, there would not be enough hours in the day
Registrar Ruth Hodson





अभिलेखागार



गत सप्ताह चर्चा के संग्रहालय से समीर जी की लिखी चर्चा के अंश पहचानने की बात का उत्तर किसी ने नहीं दिया। फिर अनूप जी ने अपनी आगामी चर्चा में पहेली का हल बताया। इस बार ऐसी कोई पहेली नहीं, केवल मूल चर्चा का एक अंश व उसका लिंक। ताकि आप सीधे वहाँ जा कर उसे पूरा पढ़ सकें। इस अभिलेखागार की पुराचर्चा को प्रति सप्ताह पुनर्नवा करने का उद्देश्य रहता है कि -



)-
जो नए ब्लॉगर प्रतिदिन जुड़ रहे हैं इस हिन्दी चिट्ठों के संसार से, वे चिट्ठों के इतिहास, उनके मुद्दे, उनके परिवेश और लेखकों से न्यूनाधिक परिचित हो पाएँ।

)-
जो चर्चाकर कभी न कभी चर्चा से जुड़े रहे हैं, उनके लेखन, शैली, भाषा व वरीयताओं से परिचय हो सके।

)-
इस बहाने पाठकीय चेतना के विकास का यत्न करना ।




[चर्चाकारः पंकज बेंगाणी]


आज युँही बैठा था तभी गुज्जु काका आ गये।
गुज्जु काका : शुं छे? मजा मां?
मैं: अरे काका, किधर चले गए थे आप?
गुज्जु काका : यु.एस. और कहाँ! गुजराती नो एक पग यहाँ ने दुसरा पग ...... सी.....धा....... यु.एस.।
मैं: ह्म्म.. बराबर है। समझ गया। हो आए।
गुज्जु काका : तो पछी शुं! मज्जा नी लाइफ छे।
मैं : ठीक है भाई, हम तो यहीं अच्छे।
गुज्जु काका : कुछ चर्चा वर्चा करी क्या?
मैं: मूड नहीं था।
गुज्जु काका : ओये.... वल्गर बात।
मैं: क्या वल्गर?
गुज्जु काका : मूड्स...
मैं: मैने... यह एक्स्ट्रा स्स्स्स नहीं लगाया ओके! उमर का लियाज करो ना काका।
गुज्जु काका : उर्मीबेन ने कुछ लिखा क्या?
मैं: क्यों, बहुत याद आ रही है?
गुज्जु काका : ही ही ही ही।
मैं: बेशर्म होते जा रहे हो आप। चलो देखते हैं... कुछ तो होगा ही... वही एक सक्रीय है।

लो देख लो है ना...अरे बाप रे इस बार तो मुक्तक लेकर आई हैं:

રે થાક્યું મન,
અટક હવે!
લે, લઇ લે ચરણ
મારા, દઉં છું
હું દાન તને!
*
બોલાઇ ગયુ
કૈંક, પણ શેં
પાછું ખેંચી શકું હું?!
લાવ, બીજો
કો’શબ્દ ઉમેરું!

रे थके मन,
रूक अब
ले ले ले इसे
मैरे, देती हुँ
दान
तुझे

कह दिया
कुछ, पर क्या
ले सकती हुँ फिर से
ला कुछ
और
शब्द मिलाऊँ

गुज्जु काका : खाश पता नहीं चला।
मै: काका वो तो समझ समझ का फेर है।
गुज्जु काका : एम? छोड बीजु क्या है?
मै: उर्मीजी, प्रेम के विषय में भी बता रही हैं।
गुज्जु काका: मन्ने उसमें इंटरेस्ट छे।
मैं : पता है मुझे, देखिए वो एक दोहा पोस्ट करते हुए कहती हैं




आधी आबादी


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गत
सप्ताह सोमवार को ही मैंने अपने आधी आबादी वाले स्तम्भ में किरण बेदी जी की चर्चा की थी। वे २००६ से ब्लॉग लिखती आ रही हैं। नवम्बर २००६ से ब्लॉग पर उनका लेखन बाधित हो गया था, जिसे गत माह ३१ जनवरी से वे पुन: लिखने लगी हैं। भविष्य में उनके नियमित लेखन द्वारा नेट पर उनके विचारों व गतिविधियों से परिचित होने वालों उनके प्रशंसकों को निराश नहीं होना पड़ेगा।

५९ वर्षीय किरण गत दिनों मानवाधिकारों से सम्बंधित एक संगोष्ठी में भाग लेने फ्रांस गयी हुई थीं, जहाँ योरोप व एशिया के आपराधिक न्यायाचारों की समकालिकता पर भी चर्चा हुई। इस संगोष्ठी पर लिखते हुए उन्होंने मूल प्रश्न "किसके मानवाधिकार?" का उठाया है। एक सक्रिय, तज्ञ, ईमानदार व निष्पक्ष एवं मानवीय व्यक्तित्व वाली सुश्री बेदी को पढ़ना स्वयं में अत्यन्त विचारोत्तेजक अनुभव होता है।

वे लिखती हैं --

But the fact is that in every case there are victims and victims. The accused with muscle and money power is open to hire expensive legal support while the victim is dependent on the over worked government prosecutor. Undoubtedly there are issues of rights on both sides. But how can we ignore one at the cost of the other? Who is speaking for the victim created by the accused? The same police who are always under pressure to deliver, despite huge constraints. The accused has a right to be quiet; defended, medically cared for; legally protected; safely lodged; even educated and reformed; to the extent that he can study and take an examination and qualify for the UPSC examination. What about the good cops who are exhausted, tired, ill equipped, most of the time no money to travel and dispose off the corpses.---When we want the maximum out of the police for the protection of human rights of the accused, (which they must), who will address their right to appropriate resources; legal support; forensics, better availability of information technology; laws, training, fitness; departmental support, material support, newer skills; their security; modern weaponry; living conditions; family and their children needs; their future? I am in no way proposing lowering of standards of human rights of the accused. They must have a right to all humane treatment and legal defense for us to remain a civilized society. All I am asking for is for how long will we continue to ignore the hapless victims who are left to themselves, scarred, injured, maimed, orphaned, deprived, impoverished, neglected, isolated, defamed? Who is going to walk the talk, legislate and implement victim’s rights? We need a more comprehensive approach to human rights and human responsibilities. We cannot just begin and end with the accused. We have to address the serious issue with that of the Accused+ Victim. In order to do that we have to dissect all the criminal justice and social processes which are impacting our trust in the justice systems?




आप
यदि सामाजिक सरोकारों से वास्ता रखते हैं तो इस ब्लॉग को बुकमार्क अवश्य करेंगे ऐसा मेरा अनुमान है।




अनंत


परीक्षाओं और होली के विरोधाभासी तेवरों से अधिकाँश परिवार जूझ रहे होंगे। जिनके बच्चे परीक्षाओं की तैयारी में संलिप्त होते हैं, वहाँ माता-पिता व परिवार भी उन्हें सहयोग दते हुए मनोबल बढाए रखने में एकाग्र रहता है। आपके परिवारों के बचे सफल-सुखी हों, माता पिता का यश बढाएं।


चर्चा मंडली व ब्लॉग -जगत को होली की अग्रिम शुभकामनाएँ ।

आपका आने वाला प्रत्येक दिन शुभ हो, सुखदाई हो!!

इत्यलं........


पुनश्च : चर्चा का शीर्षक मेरी एक काव्य पंक्ति है।




12/5/2008

“Remembering Mumbai” - in London, 5th Dec

यदि आप आज लन्दन में हैं तो


A small effort in London to remember the victims of terrorism…

Mumbai Remembrance

A quiet, non-political, non-religious time for us to stop and reflect for a while

Date: Friday, December the 5th 2008

Venue: Lecture Theatre SG06, London Business School
Regent’s Park
London NW1 4SA

Time: 1700 hrs to 2100 hrs (You are welcome to come in, whenever is suitable for you during this period)

Directions: Can be found here. Nearest tube stations: Marylebone, Regent’s Park (both on Bakerloo line), Baker Street (Circle, Hammersmith & City, Metropolitan, Jubilee and Bakerloo lines)

Thanks to London Business School and the students from India, for responding swiftly to our request and organising the venue.

***

Thanks to Shefaly, Amitabh and Ashutosh without whose support this would not have happened.

If you are in London - or know someone who is, please pass on this message to them (you can use the “tell a Friend” button below). All are welcome.

12/1/2008

अनिश्चित भविष्य वाले देश के अकर्मण्य,स्वार्थी व मूर्ख पहरुए हम।


[चर्चाकारः कविता वाचक्नवी] [ टिप्पणियाँ]







देश में स्थितियाँ निरंतर घातक बनी हुई हैं| पिछले - दिन का चिट्ठाजगत और ब्लॉगवाणी का आँकड़ा देखें तो सर्वाधिक प्रविष्टियाँ राष्ट्रीय विपदा की इस घड़ी के चहुँ ओर घूमती दिखाई देती हैं। हम आपादमस्तक लज्जा में गड़ने के खुलासों की परतें चीन्ह रहे हैं। प्रेस की भूमिका तो संदिग्ध है ही ( वैसे भी लगभग सारा दृश्य मुद्रित मीडिया विदेशी स्वामित्व का है); ऐसे में उस की वरीयता और रुचि उस सारे प्रक्षेपण में किसी राष्ट्रीय संकट से उबारने से अधिक अपने अबाध प्रसारण से चिपकों को बाँधे रखने में रही ; वरना अनेकानेक अनुत्तरदायी अवसर हमारे घरों में यों घटित होते दीखते


“टीआरपी के भूखे एक और गिद्ध” ने आतंकवादियों के इंटरव्यू भी प्रसारित कर दिये, ठीक वैसे ही जैसे सुबह तीन बजे अमिताभ के मन्दिर जाने की खबर को वह “ब्रेकिंग न्यूज” बताता है…




यह सही है कि इनमें कार्यरत कई पत्रकार अपने राष्ट्रीय सरोकारों में किसी से न्नीस नहीं होंगे किंतु वहाँ डटे रह कर प्रसारण करना इमरान बाबरी आतंकवादी का सीधा भाषण प्रसारित करना तो भयानक भूल है, कम से कम किसी कूटनीतिज्ञ को ही बातचीत के लिए उस समय नियुक्त कर दिया जाता| जिस प्रकार कीभड़काऊ बातें वह कर रहा था उन ने कितनी हानि की है इसका अनुमान आने वाली पीढियाँ लगा सकेंगी


भारत को रक्षात्मक होने की अपेक्षा आक्रामक होने व तुरत आक्रमण कर देने जैसी बातें भी हिन्दी ब्लॉग जगत पर उठीं।

मेरा तो दृढ मत है कि अब तक भारतीय वायुसेना को यह आर्डर मिल जाने चाहिए थे कि वह पाक अधिकृत आतंकी ठिकानों पर बेलौस पूरी शक्ति के साथ आक्रमण कर दे -पर हमारा नेतृत्व फिर नपुंसकता ,क्लैव्यता की राह पकड़ रहा है -हमारे ऊपर आक्रमण हुए कई दिन बीत रहे -आखिर इन सत्ता भोगियों को स्पष्ट राजनीतिक निर्णय लेने में क्या अड़चन आ रही है?

इस आक्रम का आकलन करने के साथ-साथ भारत की भावी नीति की व करणीय-अकरणीय की मीमांसा भी वैचारिकों ने की

यह कहने से काम नहीं चलेगा कि आतंकवाद एक ऐसी परिघटना है जिससे बचा नहीं जा सकता, उसके खिलाफ चाहे जितनी तैयारी कर लो। पहले तैयारी करके तो दिखाइए। इस बात की पूरी संभावना है कि प्रारंभिक सफलता के बाद यह सुरक्षा तंत्र धीरे-धीरे आलसी और निष्क्रिय हो जाए, जैसा इमरजेंसी के आखिरी दिनों में देखा गया था। अगर भारत को अपनी हिफाजत और इज्जत प्यारी है, तो कम से कम अगले दस वर्षों तक आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर एक जैसी चुस्ती दिखानी होगी। सतत निगरानी के बिना स्वाधीनता को बचाया नहीं जा सकता। मुंबई ने साबित कर दिया है कि छिटपुट आतंकवादी घटनाएँ अब खंड युद्ध का रूप ले चुकी हैं। यह एक तरह की गुरिल्ला लड़ाई थी। भविष्य में यह पैटर्न और बड़े पैमाने पर अपनाया जा सकता है। इसलिए हमारे पास इंतजार करने के लिए थोड़ा भी वक्त नहीं है।


इसी क्रम में जो खुलासे निरंतर हो रहे हैं (साजन कपूर ने तीसरे दिन बाहर आकर जो कुछ कहा उसे मुद्दा क्यों नहीं बनाया जा रहा?)उन का विवरण कोई चौंकाने वाला नहीं है ( भारत के सन्दर्भ में); यहाँ हम लोग इतने पतित हो चुके हैं कि वस्तुत: यहाँ आक्रमण एक एक व्यक्ति की अकर्मण्यता व स्वार्थ संलिप्तता का प्रमाण है.

सवाल ये उठता है कि अबू आज़मी किस हैसियत से साउदी अफसर को छुडाने ताज होटल पहुँचे थे?और अगर वे वहाँ पहुँचे भी तो उन्हे और उनके मैनेजर और समर्थकोँ को वहाँ कैसे जाने दिया गया?आखिर साउदी अफसर का अबू आज़मी से रिश्ता कया है?साउदी दूतावास के लोगो ने भारत सरकार को छोड अबू आज़मी से ताज मे फँसे अपने अफसर को छुडाने के लिये कयोँ सँपर्क किया


मध्य रात्रि में CNBC आवाज़ पर प्रत्यक्ष जो कुछ दिखाया गया उसे जान कर इसी की पुष्टि होती है कि हमारा तंत्र नकारा है क्योंकि हम नकारा हैं, तंत्र में बैठे लोग कहीं बाहर से लाकर प्रत्यारोपित किए गए नहीं हैं, वे भी हमीं हैं। और क्या मन्त्रीपद पर बैठे अपराधी लोगों से आप देश की सुरक्षा की आशा निरर्थक नहीं कर रहे हैं? राजनीति के हीरो, फ़िल्म के हीरो, क्रिकेट के हीरो, नाचगाने के कार्यक्रमों में जिन पर आप पैसा लुटाते हैं वे छुटभैये हीरो, हँसी के नाम पर फूहड़ता दिखलाने वाले तथाकथित नायक- नायिकाएँ जिन पर देश का एक एक व्यक्ति अपना तन,मन धन लुटाने में लगा हुआ था सालों से, वे सब के सब कहाँ हैं? किसने आपके प्राण बचाए? क्या धनपशुओं ने? या एकता कपूर ने? या कोमेडी सर्कस में पाकिस्तान से आकर कला के नाम पर बरसों से यहीं जमे हुए कुछ नौटंकियों ने? कला के आस्वादन का अधिकार भी है क्या हमें? प्रश्न बहुत से हैं| उत्तर नेताओं या मंत्रियों से नहीं हमें अपने आप से पूछना है| अपना आप टटोल कर तो देखें कितनी आत्मानुशासित हैं हम? कितने मध्यमार्गी हैं हम, जब ज़रा से आर्थिक लाभ के लिए किसी भी नीचता पर उतर सकते हैं|CNBC ने कल अपने अभियान में समुद्री मार्ग की परख के लिए २ डिब्बे (मानो RDX) ऐसे पार करवाए हैं कि हमारे समुद्री पहरुओं को कानों कान हवा भी नहीं लगी| मछुआरों ने १००० रु. लेकर सारा सामान सुरक्षित तट पर पहुँचा दिया| जिस स्थान पर १३ वर्ष पूर्व दाऊद ने ``सामान' उतरवाया था वहीं का प्रयोग जाँच के लिए टीम ने किया. कहीं किसी ने नहीं रोका। आज आप विस्तार से उसे स्वयं देख सकते हैं | तो यह स्थिति आक्रमण के २ दिन बाद की है| देश को यदि सुधारना चाहते हैं तो केवल एक मार्ग है, वह है आत्मानुशासन व भ्रष्ट आचरण के पूर्ण त्याग का, स्वार्थ व लाभ का लोभ तजने का, ईमानदार होने का; वरना ये सब दूध में आए हुए उबाल हैं, थोड़े दिन में स्वयं बैठ जाएँगे|

वरना तो हमारी रग रग में नफ़ा नुक्सान समाया है -


आर आर पाटिल, गृहमंत्री हैं. महाराष्ट्र जैसे राज्य के. भारत में हुए सबसे बड़े आतंकवादी हमले को "बड़े शहरों में इस तरह की छोटी-छोटी घटनाएं होती रहती हैं" बता गए. कह रहे थे कि आतंकवादी तो पॉँच हज़ार लोगों को मारने आए थे. हमारी कोशिश की वजह से केवल दो सौ लोग मारे गए. अढतालीस सौ का फायदा देखिये न आप. दो सौ का नुक्शान क्यों देखते हैं?




यही प्रश्न यहाँ भी उठाया गया है ।

ब्लोगरों से अपील भी की गयी कि वे
अपनी कलम को हथियार बना

शब्दों में बारूद भरे

सोया समाज राख समान

उसमे कुछ आग लगे


दूसरी ओर ऐसे भी सोचते लोग मिले


हुत दिनों से मैं जानना चाहता हूँ कि आख़िर ये एनकाउंटर स्पेशलिस्ट क्या बला है।
क्या ये वाकई कोई पद है जिसका आधिकारिक रूप से सृजन किया गया है या फ़िर ये मीडिया प्रदत्त उपाधि है ।मैं जानना चाहता हूँ कि कोई एनकाउंटर का स्पेशलिस्ट कैसे हो सकता है? कैसे कोई लोगों को मारने का स्पेशलिस्ट हो सकता है। ये स्पेशलिस्ट लोगों को मारता कैसे है घातलगाकर या आमने सामने कि लड़ाई में या पकड़ कर मुहँ में पिस्टल ठूंस कर...........................




यहाँ पुलिस के बन्दूक उठाने पर प्रश्न उठा तो इस जीवित पकड़े गए आतंकवादी का बन्दूक उठाए चित्र भी मेल से संसार भर में जारी हो गया

http://mallar.files.wordpress.com/2008/11/azam-terrorist.jpgHis swaggering image as he walked around Chhatrapati Shivaji terminus was captured by Mumbai Mirror photo editor Sebastian D’Souza, and was the first glimpse of the terrorists who have held Mumbai hostage over the last 48 hours.

इसी के साथी आतंकवादियों पर लिखते हुए अपने को धिक्कारा भी गया

पर हमने तो ये कसम खा रखी है कि हम नहीं सुधरेंगे। इस ग़द्दार क़ौम के साथ एकता और सद्भाव फैलाएँगे। और जैसा चल रहा है वैसा चलता रहेगा। फिर कल आतंकवादी हमला होगा फिर कुछ निर्दोष हिन्दू मारे जाएँगे, फिर से राष्ट्र के नाम प्रधानमन्त्री का मरियल सन्देश आएगा, फिर से शहीदों की याद में कुछ मोमबत्तियाँ जलेंगी और हम एक बार फिर एक नए हमले का इंतज़ार करने लगेंगे। सच्चा मुसलमान (अर्थात् धोखेबाज़ नागरिक) भी घड़ियाली आँसू बहाकर कर फिर ऐसे ही नए कुकृत्य के लिए असला जमा करने लग जाएगा। फिर से हमला होगा और इसी घटनाक्रम की पुनरावृति होती रहेगी।

हाल यहाँ भी वही है कि सवाल लाशों पर है

चैनल सर्फिंग के दौरान रिमोट का बटन हाथ से दब गया। और फिर रात के दस बजे से ढ़ाई बजे तक टीवी के पर्दे सड़क पर गिरती लाशों के मंज़र को देखता रहा। बहुत सी तसवीरें बिल्कुल दिल से नहीं निकाल पा रहा, कार्यालय यंत्रवत जा रहा हूँ पर ज़ेहन में वही बातें उमड़ घुमड़ रही हैं। कुछ प्रश्न हैं जिन्हें हर व्यक्ति पूछ रहा है, ये जानते हुए भी कि उसके प्रश्न का ईमानदारी से जवाब देने वाला यहाँ कोई नहीं...



देश के हतभाग्य पर मौन रहते-रहते, शिवराज के जाने वाले प्रकरण पर मौन रखने का व्यंग्य भी दुर्दशा का ही बयान है।


ऐसा ही एक और सटायर भी अभी पढा- जाना कि देश के लिए कुछ करने के नाम पर चलो दौड़ कर आएँ


भारत में जो हताशा और मायूसी का माहौल मुम्बई की दुखद घटनाओं के कारण चल रहा है; उसे सुधारने की यह ईमानदार और सार्थक पहल कही जायेगी। लोगों का ध्यान आतंक, खून, विस्फोट, परस्पर दोषारोपण और देश की साझा विरासत पर संदेह से हटा कर रचनात्मक कार्यों की ओर मोड़ने के लिये एक महत्वपूर्ण धर्मनिरपेक्ष कोर ग्रुप (इफभैफ्ट - IFBHAFT - Intellectuals for Bringing Harmony and Fighting Terror) ने यह निर्णय किये। यह ग्रुप आज दोपहर तक टीवी प्रसारण में अपनी रणनीति स्पष्ट करेगा। इस कोर ग्रुप के अनुसार उसे व्यापक जन समर्थन के ई-मेल मिल रहे हैं।


इसी तरह देश के हालात पर हुई एक चर्चा का लाईव टेक्स्ट भी देखिए कि आम आदमी क्या सोचता है

(इस चर्चा में भले ही अश्लील शब्दों का कहीं-कहीं जिक्र आया है, लेकिन इस चर्चा की पकड को समझने के लिये शायद यह जरूरी भी है कि ऐसे शब्दों को जस का तस कुछ ढके छिपे तौर पर सामने रखूँ। उम्मीद है, आप लोग इस चर्चा को सहज ढंग से देखेंगे। )


यहाँ भी आतंकवाद की राजनीति से राजनैतिक आतंकवाद को पढा जा सकता है


राष्ट्रीय क्षति की एक अन्य चर्चा यहाँ भी हुई।


चिट्ठे और विषयों पर भी खूब लिखे गए, लोग उबर रहे हैं उबर गए हैं परन्तु ......असल में मन है कि देश के वर्तमान से इधर उधर किसी बात पर टिक ही नहीं रहा है, सारे मसले बेमानी हो गए हैं मानोअपनों के सिधार जाने की घड़ी में जैसे आँसू नहीं थमते वही स्थिति है, पाँच दिन सेबार बार उन्नीकृष्णन की माँ का बिम्ब राष्ट्रमाता विद्यावती के चेहरे में एकाकार होता दिखाई देता है|


रसान्तर न करने की इच्छा के चलते ही दूसरे विषयों को अभी उठाना नहीं चाहती थी, परन्तु शास्त्री जी की टिप्पणी मेरी गत चर्चा से ही नदारद है तो उनका अता-पता खोजते ( कहीं उल्लेख न होने की नाराजगी तो नहीं ?)पता चला कि वे भारत के इतिहास का एक पन्ना पलट रहे थे -

यह था हमार प्यारा हिन्दुस्तान 1950 के अंत एवं 1960 के आरंभ में.

देश
की आंतरिक सुरक्षा के सूत्र भी पठनीय हैं।


समीर जी की उड़नतश्तरी भी जबलपुर लैंड हो चुकी लगती है(पिकनिक आदि मना कर)तभी उन्होंने आज वहाँ के राहुकेतु की पत्री बाँची है


सिक्किम यात्रा की अगली कड़ी यहाँ पढ़ें


हिन्दी की लघुपत्रकारिता पर आए संकट की चर्चा और प्रिंट मीडिया वर्सेज़ ऑनलाइन प्रकाशन पर विचार किया गया।





पठनीय



मैं सही सलामत हूँ

मैं इसलिए बचा हूँ
क्योंकि मैं घर में बैठा हूँ.....
यदि मैं भी वहाँ होता गेटवे या ताज पर तो
आप सब मेरा शोक मना रहे होते।
मैं इसलिए बचा हूँ क्योंकि मैं
वहाँ नरीमन हाउस में नहीं था
ओबरॉय में नहीं था जहाँ गोलियाँ चल रही थीं....
जहाँ मौत का महौल था।
मैं सच में केवल इसलिए बचा हूँ क्योंकि
मैं बच-बच कर रह रहा हूँ
मैं बच-बच कर जीने का अभ्यासी हो गया हूँ
जब से पैदा हुआ यही सिखाया गया
सब यही कहते पाए गए हैं कि बच के रहना
उधर नहीं जाना, उससे नहीं लड़ना
घर में रहना
सावधान रहना
अपना ध्यान रखना....
और मैं
घर में हूँ
अपना ध्यान रख रहा हूँ
किसी से नहीं लड़ रहा हूँ
बच कर रह रहा हूँ
इसीलिए अब तक
बचा हूँ।

PD के ब्लॉगजगत में २ वर्ष पूरे हुए किंतु मन इतना विचलित है कि जो लिखना चाहा था उसे स्थगित कर कुछऔर (देश का भविष्य) लिखा है

अंत में - आज मेरा हिंदी ब्लौगिंग में दो साल पूरा हो गया है.. मैंने बहुत पहले इस पर कुछ पोस्ट लिखेथे और सोचा था कि आज के दिन पोस्ट करूंगा मगर मन नहीं कर रहा है अभी उसे पोस्ट करने का.. फिर कभी पोस्ट करता हूं उसे..








अंत में हर औरत........ की ओर से युद्ध पर दी गयी प्रतिक्रिया


वे लड़ते हैं
लड़ना उनकी फ़ितरत है
कभी ज़र के लिए
कभी जोरू के लिए
कभी ज़मीन के लिए
कभी जुनून के लिए




वे लड़ते हैं
लड़कर उन्हें संतोष मिलता है
कभी शहीद होने का
कभी जीत के जश्न का
कभी स्वर्ग की लिप्सा का
कभी राज्य के भोग का




वे लड़ते हैं
लड़ाई उन्हें महान बनाती है
कभी वे शवाब कमाते हैं
कभी जेहाद करते हैं
कभी क्रांति लाते हैं
कभी तख्ता पलटते हैं


अंत
में -

समय का अति विलम्ब हो चुका, साढ़े नौ बजने को हैं, पूरे दो घंटे की देरी की है मैंने, सो अब ब्लॉगर बन्धु अपने अपने काम के लिए निकल चुके होंगे तो निस्संदेह उनकी प्रतिक्रियाओं से वंचित रहना होगा। अनूप जी ४ दिस. को अपने ठिकाने पर लौट आएँगे। गत सप्ताह विवेक ने बढिया चर्चा की थी, यात्रा से लौट कर परसों देखी। वे कल भी कुछ कलम का करामात दिखाएँगे।

देश की स्थितियों से उबरने तक अभी एक लाईना स्थगित है शायद। सो अब अगले सप्ताह भेंट होगी| आप सभी को अग्रिम आभार! आपका दिन मंगलमय हो |







-  कविता वाचक्नवी

11/29/2008

जिंदा लौटने में सफल रहे ब्रिटिश अभिनेता जाय जीटन : आतंक की आपबीती

मुझे मरा समझ कर छोड़ गए

 

मुंबई। वो [आतंकी] कैफे में घुसे और गोलियों की बौछार कर शुरू कर दी। घूम के इधर-उधर देखा कि कहीं कोई जिंदा तो नहीं बचा? जिसमें थोड़ी-बहुत भी हरकत देखी, उसे फिर से भून दिया। औरों के खून से लथपथ मैं जमीन पर ही पड़ा था, शायद इसलिए बच गया कि उन्होंने मुझे मरा समझ लिया। उनके चले जाने के पांच मिनट बाद मैंने आंखें खोली तो देखा हर तरफ खून ही खून, लाशें ही लाशें।

मुंबई में आतंकी हमलों से बच कर जिंदा लौटने में सफल रहे ब्रिटिश अभिनेता जाय जीटन ने कुछ इस तरह बयां किया आतंक का मंजर। यह वही अभिनेता है, जिन्होंने लंदन ब्लास्ट पर आधारित एक सीरियल 7 जुलाई 2005 बांबिंग्स में आतंकी शहजाद तनवीर की भूमिका निभाई थी। कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उन्हें खुद कभी आतंकी हमले से दो-चार होना पड़ेगा। पूर्वी लंदन में रहने वाले 31 वर्षीय जाय कहते हैं कि मेरी जिंदगी उस अजनबी की कर्जदार है जो लियोपोल्ड कैफे में हुई गोलीबारी के दौरान मुझ पर कूद गया था और मैं बच गया। पेश है अभिनेता जाय की आपबीती उन्हीं की जुबानी.. लाशों से घिरा मैं आतंकियों के निगाह से तो बच निकला, लेकिन मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुई।

भारतीय पुलिस गलती से मुझे ही आतंकी समझ बैठी। करीब 13 घंटे तक चली पूछताछ के बाद जब पुलिस को यकीन हो गया कि मैं आतंकी नहीं, एक ब्रिटिश पर्यटक हूं तो मुझे छोड़ दिया गया। अभिनेता जाय ने ही नहीं, बल्कि आतंकी हमले से बचने में सफल हुए कई विदेशी पर्यटकों ने भी अपना दर्द कुछ इसी अंदाज में बयां किया।




जान देकर निभाई मेहमाननवाजी

मुंबई। वो [आतंकी] कैफे में घुसे और गोलियों की बौछार कर शुरू कर दी। घूम के इधर-उधर देखा कि कहीं कोई जिंदा तो नहीं बचा? जिसमें थोड़ी-बहुत भी हरकत देखी, उसे फिर से भून दिया। औरों के खून से लथपथ मैं जमीन पर ही पड़ा था, शायद इसलिए बच गया कि उन्होंने मुझे मरा समझ लिया। उनके चले जाने के पांच मिनट बाद मैंने आंखें खोली तो देखा हर तरफ खून ही खून, लाशें ही लाशें।

मुंबई में आतंकी हमलों से बच कर जिंदा लौटने में सफल रहे ब्रिटिश अभिनेता जाय जीटन ने कुछ इस तरह बयां किया आतंक का मंजर। यह वही अभिनेता है, जिन्होंने लंदन ब्लास्ट पर आधारित एक सीरियल 7 जुलाई 2005 बांबिंग्स में आतंकी शहजाद तनवीर की भूमिका निभाई थी। कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उन्हें खुद कभी आतंकी हमले से दो-चार होना पड़ेगा। पूर्वी लंदन में रहने वाले 31 वर्षीय जाय कहते हैं कि मेरी जिंदगी उस अजनबी की कर्जदार है जो लियोपोल्ड कैफे में हुई गोलीबारी के दौरान मुझ पर कूद गया था और मैं बच गया। पेश है अभिनेता जाय की आपबीती उन्हीं की जुबानी.. लाशों से घिरा मैं आतंकियों के निगाह से तो बच निकला, लेकिन मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुई।

भारतीय पुलिस गलती से मुझे ही आतंकी समझ बैठी। करीब 13 घंटे तक चली पूछताछ के बाद जब पुलिस को यकीन हो गया कि मैं आतंकी नहीं, एक ब्रिटिश पर्यटक हूं तो मुझे छोड़ दिया गया। अभिनेता जाय ने ही नहीं, बल्कि आतंकी हमले से बचने में सफल हुए कई विदेशी पर्यटकों ने भी अपना दर्द कुछ इसी अंदाज में बयां किया।



पेड़ की ओट से निकल बरसाने लगे

गोलियाँ

 


मुंबई। आतंकी हमले की खबर मिलने पर हम लोग बुधवार रात छत्रपति शिवाजी टर्मिनस [सीएसटी] से कामाजी अस्पताल जा रहे थे। बमुश्किल पांच मिनट चले होंगे कि अचानक एक पेड़ के पीछे से एके 47 राइफल लिए दो व्यक्ति निकले। हम कुछ समझ पाते इसके पहले उन्होंने हमारी टोयोटा क्वालिस गाड़ी पर अंधाधुंध गोलियां बरसानी शुरू कर दी। उस हमले में एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे, पुलिस के अतिरिक्त आयुक्त अशोक काम्टे, मुठभेड़ विशेषज्ञ विजय सालस्कर और तीन पुलिसकर्मी शहीद हो गए।

आंखों में आंसू लिए आतंक के उस खौफनाक मंजर का बयान कुछ इसी तरह करता है घायल कांस्टेबल अरुण जाधव। जाधव के दाहिने हाथ में दो गोलियां लगीं हैं और वह अस्पताल में भर्ती है। जाधव आतंकियों द्वारा छीने गए उसी वाहन में सवार था जिस पर करकरे व अन्य वरिष्ठ अधिकारी सवार थे। इन अधिकारियों की हत्या के बाद आतंकियों ने उस गाड़ी को अगवा कर लिया था।

जाधव कहता है कि कार पर कितनी गोलियां दागी गई, इस बारे में सही- सही नहीं बताया जा सकता, लेकिन तीन शीर्ष पुलिस अधिकारी और तीन पुलिसकर्मी घटनास्थल पर ही मारे गए। वह बताता है कि सालस्कर गाड़ी चला रहे थे, काम्टे आगे की सीट पर बैठे थे और करकरे हम चार पुलिसकर्मियों के साथ पीछे वाली सीट पर थे। जाधव ने कहा कि आतंकी गोलियां चलाते हुए हमारे वाहन के पास आए और करकरे, काम्टे और सालस्कर के शवों को खींचकर सड़क पर फेंक दिए। मुझे कार में ही छोड़ दिया।

आतंकियों ने यह सोचा कि सब कांस्टेबल भी मर चुके हैं। उन्हें वहां से भागने की जल्दी थी, लिहाजा बगैर देर किए दोनों आतंकी कार में घुसे और मेट्रो जंक्शन की ओर चल दिए। उन्होंने मेट्रो जंक्शन पर खड़े पत्रकारों व पुलिस वाहनों पर तीन गोलियां चलाई। इसके बाद कार सहित दक्षिणी मुंबई स्थित विधान भवन की ओर भाग गए। वहां उन्होंने फिर कुछ गोलियां चलाई। जाधव ने कहा कि आतंकियों ने फिर विधान भवन से कार चलानी शुरू की लेकिन उसका टायर फट गया। इसके बाद वे कार से उतर गए और दूसरे वाहन की तरफ दौड़े।

उसने तब पुलिस नियंत्रण कक्ष से संपर्क किया और सभी पुलिसकर्मियों के मारे जाने की सूचना दी। पुलिस के अतिरिक्त आयुक्त [एटीएस] परमबीर सिंह और अन्य पुलिसकर्मी घटनास्थल पर पहुंचे तथा शवों को सेंट जार्ज अस्पताल पहुंचाया। उस वाहन में सवार बचने वाला एकमात्र पुलिसकर्मी जाधव के अनुसार शुरू में हमारी टीम को यह सूचना मिली थी कि कामाजी अस्पताल में हुई गोलीबारी में सदानंद दाते घायल हो गए हैं। इसीलिए हम सभी अस्पताल जा रहे थे।

नम आंखों से उसने कहा कि मैं 12 साल की पुलिस की अपनी नौकरी में सालस्कर के साथ काम करता रहा हूं लेकिन उनकी जान बचाने के लिए मैं कुछ नहीं कर पाया।


(जागरण )


11/19/2008

"विश्वम्भरा" का वार्षिक अधिवेशन

षष्ठ 'विश्वम्भरा' स्थापना दिवस समारोह  संपन्न

हैदराबाद, 13 नवंबर 2008 .



भारतीय जीवन मूल्यों के अंतर्राष्ट्रीय प्रचार प्रसार के लिए समर्पित सामाजिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था
"विश्वम्भरा" का छठा वार्षिकोत्सव और स्थापनादिवस व्याख्यान १२ नव. २००८, बुधवार को आन्ध्रप्रदेश हिन्दी अकादमी के गगनविहार, नामपल्ली, हैदराबाद स्थित सभागार में आयोजित किया गया।


कार्यक्रम की अध्यक्षता दैनिक समाचारपत्र 'स्वतन्त्रवार्ता' के सम्पादक डॊ. राधेश्याम शुक्ल ने की तथा संस्था के मानद मुख्य संरक्षक ज्ञानपीठ पुरस्कार गृहीता प्रसिद्ध साहित्यकार पद्मभूषण डॊ. सी.नारायण रेड्डी विशेषरूप से उपस्थित रहे। ( उल्लेखनीय है कि इस अवसर पर प्रसिद्ध चित्रकार एवं कला समीक्षक पद्मश्री जगदीश मित्तल विशेष अतिथि के रूप में पधारने वाले थे, परन्तु भ्रमवश वे आन्ध्रप्रदेश हिन्दी अकादमी के बजाय दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा में पहुँच गए और प्रतीक्षा करते रहे; क्योंकि विगत वर्षों में यह आयोजन वहीं सम्पन्न होता रहा था)।


" विश्वम्भरा : भारतीय जीवनमूल्यों की संकल्पना " के छठे वार्षिकोत्सव के अवसर पर अंग्रेजी विदेशीभाषा विश्वविद्यालय (EFLU) के रूसी भाषा विभाग के आचार्य प्रोफ़ेसर जगदीश प्रसाद डिमरी ने
"संस्कृति और संस्कृत" विषय पर "विश्वम्भरा स्थापनादिवस व्याख्यान" दिया।


उल्लेखनीय है कि डॊ. जगदीश प्रसाद डिमरी भारतीय रूसी भाषाविज्ञान के मर्मज्ञ विद्वान हैं। उन्होंने १९७३ में मॊस्को से पीएच.डी. की तथा केन्द्रीय अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा संस्थान, हैदराबाद में विभिन्न शैक्षणिक एवं प्रशासनिक पदों पर नियुक्त रहे। प्रो. डिमरी इस समय भारत में रूसी के वरिष्ठतम प्रोफ़ेसर हैं तथा २००५ में केन्द्रीय अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा संस्थान, हैदराबाद के कुलपति भी रह चुके हैं। उन्हें पाणिनि के व्याकरण, पतंजलि के महाभाष्य, भारतीय काव्यशास्त्र और सौन्दर्यशास्त्र तथा सांस्कृतिक भाषा शिक्षण के पाठ्यक्रम आरम्भ करने का भी श्रेय प्राप्त है।


अतिथियों के मंचासीन होने के उपरान्त 'विश्वम्भरा' के वार्षिकोत्सव का श्रीगणेश दीप प्रज्वलन के साथहुआ। प्रख्यात पर्यावरणविद् तथा उस्मानिया विश्वविद्यालय के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. किशोरी लाल व्यास ने मंगलाचरण किया तथा सुषमा बैद ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की।


संस्था की ओर से अतिथियों का चंदन, हल्दी और कुंकुम के तिलक, अक्षत, अंगवस्त्र और श्रीफल द्वारा पारंपरिक ढंग से स्वागत किया गया।


संस्था की संस्थापक-महासचिव डॉ. कविता वाचक्नवी ने 'विश्वम्भरा' के उद्देश्यों गतिविधियों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि २००२ में गठित यह संस्था जनसंचार के सभी पारम्परिक आधुनिक माध्यमों का प्रयोग करके सम्पूर्ण विश्व में भारतीय संस्कृति द्वारा प्रतिष्ठित जीवनमूल्यों का प्रचार-प्रसार करने के लिए संकल्पबद्ध है। उन्होंने जानकारी दी कि विश्वम्भरा ने नई पीढ़ी को लक्षित करके प्राईवेट और पब्लिक स्कूलों में भारतीय जीवनमूल्यों और शारीरिक, आत्मिक सामाजिक उन्नति से सम्बन्धित पाठ्यक्रमों, व्याख्यानों तथा कार्यशालाओं का आयोजन किया है डॊ. वाचक्नवी ने यह भी बताया कि भाषा और संस्कृति के अन्योन्याश्रय सम्बन्ध में विश्वास करने के कारण "विश्वम्भरा" हिन्दी अन्य भारतीय भाषाओं के प्रचार-प्रसार में भी संलग्न है तथा इसके लिए इंटरनेट के माध्यम का बखूबी उपयोग कर रही है।


तदनन्तर मुख्य वक्ता प्रो. जगदीश प्रसाद डिमरी ने सभा को "संस्कृति और संस्कृत" विषय पर सम्बोधित किया। उन्होंने कहा कि, ''संस्कृति समस्त मानवता को विशेषता और भूषण प्रदान करती है वह जनसमुदाय के उन उच्च विचारों और आदर्शो का समन्वित रूप होती है जिनसे संपन्न होने पर किसी व्यक्ति अथवा समाज को सुसंस्कृत माना जाता है। सदाचार और सद्बुद्धि से लेकर समस्त प्रकार के आचार-व्यवहार और नैतिक विचार संस्कृति में समाविष्ट होते हैं।''


प्रो. डिमरी ने संस्कृत व्याकरण के अनुसार 'संस्कृति' की व्युत्पत्ति पर विचार करते हुए बल देकर कहा कि अंग्रेज़ी का 'कल्चर' शब्द इसका सटीक पर्याय नहीं है। उन्होंने भारतीय संस्कृति की परंपरा का उल्लेख करतेहुए बताया कि वैदिक साहित्य के समान सर्वधर्मसमभाव से संपन्न साहित्य विश्व में अन्यत्र उपलब्ध होना दुर्लभ है।


प्रो.जगदीश प्रसाद डिमरी ने अपने व्याख्यान में संस्कृति की नित्यता का प्रतिपादन किया और कहा कि वह रूढ़िवादिता कदापि नहीं है। उन्होंने भारतीय संस्कृति में सह अस्तित्व के विचार को रेखांकित करते हुए कहा कि उसका स्वरूप बहुलतावादी है और अपनी 'अनेकता में एकता' एवं 'एकता में अनेकता' को साधने की शक्ति के कारण ही वह समग्र मनुष्य जाति के लिए ग्राह्य है। उन्होंने भारतीय संस्कृति को जातिवाद से जोड़ने के विचार का खंडन करते हुए आंध्रप्रदेश, उत्तराखंड और बंगाल में 'महाभारत' की मूल भावना को सुरक्षित रखने में सामाजिक दृष्टि से पिछड़ी समझी जानेवाली जातियों के योगदान की ओर ध्यान दिलाया और कहा कि इन सब सांस्कृतिक धरोहरों को सुरक्षित बनाए रखना प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य है।


संस्कृति और साहित्य के संबंध की चर्चा करते हुए डॉ. डिमरी ने आगे कहा कि रीति-रिवाजों और साहित्य से संस्कृति का घनिष्ठ संबंध है। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी माना कि भारतीय परंपरा में पर्वत, वृक्ष और नदी आदि समस्त प्राकृतिक संपदा को सांस्कृतिक संपदा का स्थान प्राप्त है इसीलिए हिमालय को यहाँ `देवतात्मा' तथा गंगा को 'देवनदी' कहा गया है। उन्होंने सांस्कृतिक अनेकता को भारत की प्रगति और सार्वभौमिकता का आधार बताते हुए कहा कि इसे स्वानुभूति और लोकव्यवहार द्वारा ग्रहीत और पुष्ट किया  जा सकता है।


संस्कृति को मनुष्य का 'संस्कार' और 'परिमार्जन' करने वाली साधना का प्रतीक मानते हुए डॉ. जगदीशप्रसाद डिमरी ने कहा कि भाषा और साहित्य के विविध रूपों में हमारी यह संस्कृति लंबी कालयात्रा करके हम तक पहुँची है और हमारा दायित्व है कि हम इसे और भी पुष्ट रूप में अगली पीढ़ियों को सौंपें।


इस अवसर पर 'विश्वम्भरा' की ओर से स्थापनादिवस व्याख्यानदाता प्रो. डिमरी का सारस्वत अभिनंदन किया गया तथा उन्हें संस्था का रजत स्मृतिचिह्न भेंट किया गया।


संस्था के मानद मुख्य संरक्षक ज्ञानपीठ पुरस्कार ग्रहीता साहित्यकार पद्मभूषण डॉ. सी.नारायण रेड्डी ने विश्वम्भरा' की गतिविधियों पर प्रसन्नता प्रकट की और आशा व्यक्त की कि भविष्य में भारतीय संस्कृति और भारतीय भाषाओं के प्रचार-प्रसार में यह संस्था और भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। उन्होंने ध्यान दिलाया कि संस्कृति हमारे `होने' का पर्याय है तथा सभ्यता हमारी `भौतिक उपलब्धियों' का द्योतन कराती है। उनके अनुसार संस्कृति का क्षेत्र अत्यन्त विशाल है जिसके अन्तर्गत समस्त कलाओं से लेकर आचार-व्यवहार तक सब कुछ समा जाता है।


पर्यावरणविद् कथाकार एवं कवि प्रोफ़ेसर किशोरीलाल व्यास ने बलपूर्वक कहा कि भारतीय संस्कृति जिन अनेक कारणों से आज सारे विश्व के लिए प्रासंगिक है उनमें से एक हमारी पर्यावरण सम्बन्धी चेतना है क्योंकि हम प्रकृति से प्रतियोगिता नहीं मानते और ही उसे जीतने में विश्वास रखते हैं, बल्कि हमारा विश्वास 'जियो और जीने दो' की नीति में है।


समारोह की अध्यक्षता करते हुए 'स्वतंत्रवार्ता' के संपादक डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने इस बात पर हर्ष व्यक्त किया कि विश्व सूचना के माध्यम इंटरनेट को अपना कर विगत वर्ष में 'विश्वम्भरा' ने भारतीय संस्कृति और हिंदी की सेवा के क्षेत्र में सराहनीय उपलब्धि दर्ज की है। उन्होंने संस्कृति की व्याख्या संस्कृत परम्परा के आधार पर करने की सराहना की और कहा कि विविध भारतीय भाषाओं में व्यक्त चिन्तन परम्परा मूलत: एक है। भिन्नता के बीच एकता को पहचानने पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि किसी भी देश के लिए सांस्कृतिक अहंकार से दूर रहना ही श्रेयस्कर होता है क्योंकि स्थानीय संस्कृतियाँ नहीं बल्कि मानव-संस्कृति सर्वोपरि है।


संस्था के उत्स से ही अपना मार्गदर्शन देते रहे "विश्वम्भरा" के संवीक्षक वरिष्ठ कवि-समीक्षक ( तेवरी काव्यान्दोलन के प्रणेता) दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा के विश्वविद्यालय खंड ( स्नातकोत्तर और शोधसंस्थान) के अध्यक्ष प्रोफ़ेसर ऋषभदेव शर्मा ने अपनी अत्यंत चिन्तनधर्मी सहज शैली में कार्यक्रम का संचालन करते हुए संस्था को उसके लक्ष्यों के प्रति सावधान सचेत रहने की अपनी अपेक्षा दुहराई और उत्तरोत्तर नए संसाधनों के प्रयोग के प्रति जागरूक रह कर कार्यक्षेत्र का निरन्तर विस्तार करने को सराहते हुए नई योजनाओं की रूपरेखा के अनुपालन पर भी बल दिया।


'निर्दोष सोशल सर्विसेज़' के अध्यक्ष डॊ. रामकुमार तिवारी ने संस्था को शुभकामनाएँ देते हुए सभासदों सहयोगियों का "विश्वम्भरा" की ओर से आभार व्यक्त किया।



इस अवसर पर चंद्रमौलेश्वर प्रसाद (कोषाध्यक्ष), द्वारका प्रसाद मायछ ( संरक्षक), गुरुदयाल अग्रवाल, श्रीनिवास सोमानी, वीरप्रकाश लाहोटी सावन, वेणुगोपाल भट्टड़ (ख्यातकवि), भँवरलाल उपाध्याय, रामजी सिंह उदयन( सम्पादक - डेली हिन्दी मिलाप), एफ.एम. सलीम (पत्रकार), के. प्रवीण, शिवकुमार राजौरिया, के. दास, कैलाशवती, आर. सुरेंद्र, श्रद्धा तिवारी, के. रवि, आनंद लालाजी, पी.आर. घनाते (सं.- मिलिन्द), पवित्रा अग्रवाल ( कथाकार), लक्ष्मीनारायण अग्रवाल ( कवि कथाकर), रूबी मिश्र, अभिषेक दाधीच, आशादेवी सोमानी(सम्पादक- अहल्या), तुलजाप्रसाद विमल, जी. परमेश्वर, डॉ. अनुपमा, डॉ. बी. सत्यनारायण( अकादमी के शोध सहायक), डॉ. बी.बालाजी, डॉ.प्रभाकरत्रिपाठी (अध्यक्ष-हिन्दीविभाग, हि.महावि.), डॉ.रेखा शर्मा (अध्यक्ष, हिं. विभाग विवेकवर्धिनी ), डॉ. अहिल्या मिश्र, डॉ. टी. मोहन सिंह(पूर्व प्राचार्य व अध्यक्ष हि.वि. उस्मानिया वि.वि.), डॉ. जे.वी.कुलकर्णी, शेखर, रामकृष्णा आदि ने अपनी सक्रिय भागीदारी से चर्चा-परिचर्चा और समारोह को जीवंत बनाया।


- डॉ. कविता वाचक्नवी
महासचिव, "विश्वम्भरा"


 

Dr. Kavita Vachaknavee

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rishabhawrote:
'sahitya amrit' wali kavita par utsahvardhak tippani ke liye aabhaaree hoon.
 
 
Aug. 23